यूजीसी नोटिफिकेशन : भाजपा की सामाजिक इंजीनियरिंग में दरार?
केंद्र सरकार द्वारा जारी यूजीसी का नया नोटिफिकेशन अब केवल शिक्षा सुधार का दस्तावेज़ नहीं रहा, बल्कि यह भाजपा की राजनीतिक समझ और सामाजिक संतुलन की अग्नि-परीक्षा बन चुका है। जिस नीति को “समानता” के नाम पर पेश किया गया, वही आज सवर्ण समाज की नजर में भेदभाव का औज़ार बनती दिख रही है।सवाल यह नहीं है कि दलित-पिछड़े वर्गों को अवसर मिलना चाहिए या नहीं—सवाल यह है कि क्या सरकार एक वर्ग को साधने के चक्कर में द
lucknow
1:39 PM, Jan 27, 2026
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लखनऊ यूनिवर्सिटी के गेट पर यूजीसी कानून का विरोध करते छात्र फोटो सौ.bma7
उत्तर प्रदेश । लखनऊ विश्वविद्यालय में यूजीसी को लेकर छात्रों के जोरदार प्रदर्शन से अब विरोध और प्रबल होता जा रहा है। सैकड़ों की संख्या में छात्र विश्वविद्यालय के मुख्य गेट पर धरने पर बैठे और प्रदर्शन किया। प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने UGC के खिलाफ नारेबाजी की और अपनी मांगों को लेकर विरोध जताया। छात्रों का कहना है कि UGC के हालिया फैसलों से उनकी पढ़ाई और भविष्य पर असर पड़ रहा है। मौके पर भारी संख्या में छात्र मौजूद रहे, जिससे विश्वविद्यालय परिसर में तनावपूर्ण माहौल बना रहा।
यूजीसी भाजपा के लिए 2027 की अग्निपरीक्षा
केंद्र सरकार द्वारा जारी यूजीसी का नया नोटिफिकेशन अब केवल शिक्षा सुधार का दस्तावेज़ नहीं रहा, बल्कि यह भाजपा की राजनीतिक समझ और सामाजिक संतुलन की अग्नि-परीक्षा बन चुका है। जिस नीति को “समानता” के नाम पर पेश किया गया, वही आज सवर्ण समाज की नजर में भेदभाव का औज़ार बनती दिख रही है।सवाल यह नहीं है कि दलित-पिछड़े वर्गों को अवसर मिलना चाहिए या नहीं—सवाल यह है कि क्या सरकार एक वर्ग को साधने के चक्कर में दूसरे को नाराज़ करने का जोखिम उठा रही है?
सवर्ण असंतोष : खामोशी से उबलता आक्रोश का लावा
भाजपा के लिए सबसे चिंता की बात यह है कि विरोध किसी राजनीतिक दल के मंच से नहीं, बल्कि समाज के भीतर से उठ रहा है। शिक्षित युवा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र और मध्यम वर्ग—जो अब तक भाजपा की रीढ़ माने जाते रहे—आज खुलकर सवाल पूछ रहे हैं।यह वही वर्ग है जिसने नोटबंदी, जीएसटी और अग्निवीर जैसी नीतियों पर भी लंबे समय तक धैर्य रखा। लेकिन यूजीसी नोटिफिकेशन ने उनके भीतर यह भावना पैदा कर दी है कि “मेरिट अब संदेह के घेरे में है”।
उत्तर प्रदेश : जहां चिंगारी आग बन सकती है
उत्तर प्रदेश में यह मुद्दा साधारण नहीं है। यहां सवर्ण वोटर कई लोकसभा और विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। 2027 का विधानसभा चुनाव दूर नहीं है, और विपक्ष इस असंतोष को हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा।यदि यह संदेश ज़मीन तक गया कि “भाजपा सरकार सवर्ण समाज की सुनवाई नहीं कर रही,” तो इसका सीधा असर मतदान व्यवहार पर पड़ सकता है। राजनीतिक इतिहास गवाह है कि जब सामाजिक असंतोष चुनावी मुद्दा बनता है, तो सत्ता की कुर्सी डगमगाने लगती है।
केंद्र सरकार की चुप्पी: रणनीति या चूक?
अब तक केंद्र सरकार की ओर से न तो ठोस सफाई आई है और न ही कोई भरोसेमंद संवाद। यही चुप्पी आज सबसे बड़ा राजनीतिक जोखिम बनती जा रही है।भाजपा की ताकत हमेशा रही है—सामाजिक संतुलन और स्पष्ट संदेश। लेकिन यूजीसी नोटिफिकेशन के मामले में सरकार का संदेश अस्पष्ट है और असंतोष स्पष्ट।यूजीसी का यह नोटिफिकेशन भाजपा के लिए नीतिगत नहीं, राजनीतिक समस्या बन चुका है।अगर सरकार समय रहते संवाद, संशोधन या स्पष्ट दिशा नहीं देती, तो यह मुद्दा केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहेगा—यह चुनावी मंचों और मतदान पेटियों तक पहुँचेगा।भाजपा को यह तय करना होगा कि वह सामाजिक संतुलन की राजनीति करेगी या वर्गीय असंतोष की कीमत चुकाएगी।
यूजीसी कानून के खिलाफ भाजपा पदाधिकारियों ने दिया सामूहिक स्तीफा bma7.in
UGC संशोधन की मांग को लेकर लखनऊ भाजपा के कुम्हरावा मंडल महामंत्री अंकित तिवारी ने अपने दस पदाधिकारियों के साथ सामूहिक रुप से स्तीफा दे दिया। उनका यह स्तीफा सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। भाजपा जिलाध्यक्ष विजय मौर्या ने बताया कि अभीतक लिखित तौर पर कोई स्तीफा उनके पास नही पहुंचा है।भाजपा के कुम्हरावा मंडल महामंत्री अकिंत तिवारी ने कहा है कि,वह 20 साल से भाजपा की सेवा कर रहे है। लेकिन यह यूजीसी कानून उनको और उनके साथियों को मंजूर नही है। उनका विरोध इस नए कानून से है। इस यूजीसी कानून को संशोधन करके लागू किया जाए। उनके साथ मंडल मंत्री,शक्ति केन्द्र संयोजक,युवा मोर्चा के पदाधिकारी,बूथ अध्यक्ष और पूर्व सेक्टर संयोजक भी स्तीफा दे रहे है। जिसमें आलोक सिंह,महावीर सिंह,मोहित मिश्रा,नीरज पाण्डेय,राज विक्रम सिंह,अनिषेक अवस्थी,विवेक सिंह,कमल सिंह शामिल है।

लेखक के बारे में
राज प्रताप सिंह
वरिष्ठ संवाददाता