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गणतंत्र दिवस स्पेशल : आजादी की जंग का वह घर, जहाँ नेहरू आते थे छिपकर

बख्शी का तालाब के भोलानाथ गुप्ता उन स्वतंत्रता सेनानियों में थे, जिन्होंने न पद चाहा,न पहचान बस आज़ादी चाही।वर्ष 1930 में जब महात्मा गांधी ने दांडी यात्रा कर नमक कानून तोड़ा, तब राजधानी में अंग्रेज़ी हुकूमत को खुली चुनौती देने वालों में भोलानाथ गुप्ता भी शामिल थे।वे अपने साथियों के साथ झंडेवाला पार्क पहुँचे और नमक बनाकर कानून तोड़ा।अंग्रेज़ों ने आंदोलन को कुचलने के लिए लाठीचार्ज किया घोड़े दौड़ाए।

lucknow

3:59 AM, Jan 26, 2026

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गणतंत्र दिवस स्पेशल : आजादी की जंग का वह घर, जहाँ नेहरू आते थे छिपकर
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम देवी गुप्ता व भोलानाथ गुप्ता फोटो सौ. bma7

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लखनऊ/ देश आज़ाद हुआ… तिरंगा फहराया गया… संविधान लागू हुआ…लेकिन आज़ादी की इस रौशनी में कई ऐसे दीपक बुझ गए, जिनकी लौ ने इस देश को राह दिखाई थी। राजधानी लखनऊ के बख्शी का तालाब क्षेत्र अंतर्गत भौली गांव का एक साधारण-सा घर भी उन्हीं गुमनाम अध्यायों में शामिल है, जहाँ कभी जवाहरलाल नेहरू जैसे नेता अंग्रेज़ों से बचकर गुप्त बैठकों में शामिल हुआ करते थे। उस घर के मालिक थे भोलानाथ गुप्ता।

अंग्रेज इन्हें मरा समझ पोस्टमार्टम हाउस भेज चुके थे

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जिला कांग्रेस कमेटी द्वारा दिया गया आजादी या मौत का प्रमाण पत्र फोटो सौ.bma 7

भोलानाथ गुप्ता उन स्वतंत्रता सेनानियों में थे, जिन्होंने न पद चाहा, न पहचान बस आज़ादी चाही। वर्ष 1930 में जब महात्मा गांधी ने दांडी यात्रा कर नमक कानून तोड़ा, तब राजधानी में अंग्रेज़ी हुकूमत को खुली चुनौती देने वालों में भोलानाथ गुप्ता भी शामिल थे। वे अपने साथियों के साथ झंडेवाला पार्क पहुँचे और नमक बनाकर कानून तोड़ा।अंग्रेज़ों ने आंदोलन को कुचलने के लिए लाठीचार्ज किया, घोड़े दौड़ाए। इसी हिंसक कार्रवाई में भोलानाथ गुप्ता बुरी तरह घायल हो गए। हालत इतनी नाज़ुक थी कि अंग्रेज़ अफसरों ने उन्हें मृत मानकर पोस्टमार्टम हाउस भिजवा दिया। डॉक्टरों ने जब सांसें चलती देखीं, तब उनका इलाज शुरू हुआ।9 जून 1930 को उन्हें छह माह के कठोर सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई।

1930 से 1941 तक तीन बार जेल गए भोलानाथ गुप्ता

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सिटी मजिस्ट्रेट द्वारा जेल व जुर्माने का आदेश फोटो सौ bma 7

जब भोलानाथ गुप्ता जेल से बाहर आए तो उनका संघर्ष और तेज हो गया। उनका घर आज़ादी की लड़ाई का गुप्त केंद्र बन गया। यहीं बैठकर आंदोलन की रणनीतियाँ बनती थीं। अंग्रेज़ खुफिया तंत्र को इसकी भनक लगी और 7 अप्रैल 1932 को भोलानाथ गुप्ता को फिर गिरफ्तार कर लिया गया। इस बार भी छह माह का कठोर कारावास और 20 रुपये अर्थदंड लगाया गया। अर्थदंड न देने पर अतिरिक्त सजा भी भुगतनी पड़ी।संघर्ष की यह गाथा 1941 में अपने सबसे भावुक मोड़ पर पहुँची। 22 मई 1941 को भोलानाथ गुप्ता अपनी पत्नी रामदेवी के साथ अपने बीमार, दुधमुंहे बच्चे की दवा लेकर लौट रहे थे। तभी पक्का पुल के पास अंग्रेज़ों ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया। पति ने पत्नी को रोका की बच्चा अभी छोटा है।लेकिन रामदेवी का जवाब आज़ादी के इतिहास में अमर हो गया।

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जुर्माना न अदा कर पाने पर बढ़ाए गए सजा का आदेश फोटो सौ. bma7

दुधमुंहे बच्चे को छोड़ पत्नी रामदेवी भी गई थीं जेल

रामदेवी ने कहा कि “भारत माता के कितने बेटे कुर्बान हो रहे हैं, एक भेंट मेरी तरफ से भी हो जाए।” अदालत ने भोलानाथ गुप्ता को एक वर्ष और रामदेवी गुप्ता को तीन माह का कारावास सुनाया। दुधमुंहे बच्चे के साथ जेल काटने वाली यह महिला आज भी इतिहास की सबसे उपेक्षित वीरांगनाओं में गिनी जाती हैं।आज़ादी के बाद 1968 में भोलानाथ गुप्ता का निधन हो गया। उनकी जीवनसंगिनी रामदेवी गुप्ता ने 14 अगस्त 2010 को आज़ादी की पूर्व संध्या पर इस दुनिया को अलविदा कहा।विडंबना यह है कि जिनके घर से आज़ादी की लड़ाई को दिशा मिली, आज उसी क्षेत्र में उनके नाम का न कोई स्मारक है, न सड़क, न संस्थान। नेता आए, भाषण दिए, आश्वासन दिए और चले गए—लेकिन भोलानाथ गुप्ता और रामदेवी गुप्ता आज भी गुमनामी के अंधेरे में खड़े सवाल बने हुए हैं।

राज प्रताप सिंह

लेखक के बारे में

राज प्रताप सिंह

वरिष्ठ संवाददाता

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